वैश्वीकरण के परिदृश्य में लुप्त होता साहित्य और संस्कृति

 

Dr. Mrs. Vrinda Sengupta1, Ku. Vandana Pandey2

 

1Asstt. Prof. Sociology, Govt. T.C.L.P.G. College,  Janjgir (C.G.)

2Asstt. Professor (Hindi), Govt  T.C.L..P.G. College Janjgir

 

सारांश-

साहित्य और समाज का अटूट संबंध है। जिस प्रकार सूर्य की किरणों से जगत में प्रकाश फैलता है, उसी प्रकार साहित्य के अवलोकन से समाज में चेतना का संचार होता है। साहित्य समाज के निर्माण में योग देता है और समाज के द्वारा ही साहित्य का निर्माण होता है। अतः दोनों एक दूसरे के पूरक है।

 

वैश्वीकरण, भूमण्डलीय करण और वैश्विक अर्थव्यवस्था द्वारा गढ़े गए शब्द है। वैश्वीकरण कोई आकस्मिक घटना या परिस्थिति नहीं है, बल्कि यह एक अनवरत प्रक्रिया है जो लंबे समय से चली आ रही है। इसे पूॅजीवाद का सबसे आंतरिक स्तर कहा जाए तो अतिश्याक्ति नहीं होगी, जिसके अंतर्गत अंदरुनी और बाहरी दोनों ही तरह से विस्तार की क्रिया मौजूद रहती है। ‘‘ वैश्वीकरण और शिक्षा ’’ अमूर्त एसा विषय है। अतः वैश्वीकरण की आंतरिक शक्तियों और उसके स्वभाव का थोड़ा विस्तार से विश्लेषण आवश्यक जान पड़ता है। अगर हम इतिहास के पाॅच सौ वर्षों पर नजर दौड़ाते हैं तो पूॅजीवादी, साम्राज्यवादी शोषण का बदला नाम वैश्वीकरण है। वास्तव में ‘‘ वसुधैव कुटुम्बकम् ’’ का भ्रम पैदाकर दुनिया गाॅव में तब्दील हो रही है, कहना! कितना सम्मोहन पैदा करता है। वैश्वीकरण एक ऐसे वैश्विक अभिजात वर्ग की संरचना कर रहा है। जो अमीर है, चलायमान और सयुक्त है। दुनिया का बहुमत यानि आमजन परिधि की ओर समान ढकेला जा रहा है। यह वैश्वीकरण ही है जो देश के रुप में नहीं बल्कि  ‘‘ बाजार ’’ के रुप में पहचानता है। ‘‘ बोलो तुम क्या-क्या खरीदोगे ’’ की तर्ज पर पूरे विश्व में दौड़ लगाता है।

 

साहित्य समाज का दर्पण होता है अच्छे साहित्य के बिना किसी भी ग्राम, राज्य, राष्ट्र, की कल्पना करना बेमानी होगी। अच्छा  साहित्य अच्छे व्यक्तित्व के विकास में सक्रिय योगदान देता है। यद्यपि देश और परिस्थतियों के अनुसार साहित्य का स्वरुप बदलते रहता है। अच्छा साहित्य के माध्यम से हम अच्छे समाज की कल्पना कर सकते है। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में साहित्य का अमूल्य योगदान होता है। समाज में साहित्य के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। साहित्य ही समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है एवं भूमण्डलीयकरण के युग में साहित्य समाज के लिए चुनौतीपूर्ण है।

 

शब्दकुंजी:-वैश्वीकरण, साहित्य, समाज, अवलोकन, संस्कृति।

 

साहित्य पर समाज का प्रभाव:-

साहित्य के निर्माण में साहित्य का प्रमुख हाथ रहता है। और बिना समाज के साहित्य का निमाण असंभव है। जिस समय का समाज जैसा होगा, उस समय उसी पं्रकार का साहित्य की रचना की जायेगी। इसलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है। यदि हम किसी समाज या जाति के उत्थान-पतन, आचार-व्यवहार, सभ्यता, संस्कृति आदि को देखना चाहते है तो यह हमे उस समय समाज से संबंधित साहित्य उच्च कोटि का होता ळें

 

समाज पर साहित्य का प्रभाव:-

समाज अपने अनुरुप साहित्य को बदलता है, तो साहित्य, समाज  को बदलने का प्रयासकरता है। साहित्य मनुष्य को गतिशील प्रदान करता है। वह अन्ध-विश्वासों, रुढ़ियों एवं सड़ी-गली मानसिकता को दूर कर समाज को नयी रोशनी प्रदान करता है। यदि फ्रांस में रुसों का, रुस में माक्र्स का साहित्य नहीं होता तो इन देशों में क्रांति नहीं हुई होती।  हमारे देश में भी इस प्रकार के उदाहरणों की कमी नहीं है। तुलसी और सूर के साहित्य ने समाज में भक्ति का संचार किया।

 

महत्व:-

साहित्य मस्तिष्क का भोजन है:-

अपने मस्तिष्क को तरोताजा रखने के लिए साहित्य का अध्ययन बहुत आवश्यक है माना कि यह विज्ञान का युग है किन्तु विज्ञान मनुष्य को शक्तिशाली बनाकर बाघ से भी भयंकर बना सकता है। किन्तु प्रेम, दया, सेवा, उपकार जैसे मानवीय गुणों का संचार साहित्य ही कर सकता है। जिसके सामने सारी भौतिक समृद्धि तुच्छ है इसलिए पाश्चात्य विद्धान कार्लाईल ने साहित्य की सर्वोपरी महत्ता को स्वीकार करते हुए लिखा है- ‘‘ मैं ब्रिटिश साम्राज्य छोड़ सकता हॅू, पर शेक्सपियर की रचना को नहीं छोड़ सकता। ‘‘

 

वर्तमान परिपेक्ष्य में मानव पाश्चात्य रंग में इतने डूब गए हैं कि  हम उससे निकलने में अपना विनाश समझते हैं। विज्ञान के बढ़िते चरणों ने हमारे मनोबल को झकझोर कर दिया है। आज हमारा समाज भग्न हो  और नई सभ्यता के पुजारी उसका तमाशा देख रहे हैं। समाज को उत्कृष्ट साहित्य की आवश्यकता है, जिससे उसका उत्थान हों सके। हम साहित्य को नये-नये आयाम दें , काव्यों की रचना हमारे कर्मो के अनुरुप हो, कहानी हमारे जीवन में गहरी उतरे और गीतों के बीच हमारे हृदय में अंकुरित हो। हमारा समाज अपने पुराने वैभव को प्राप्त कर सकें, इसकेे लिए हम साहित्य को नये आयाम दें।

 

‘‘अंधकार है वहाँॅं, जहाॅँ आदित्य नहीं है।

मुर्दा है वह देश जहाॅ साहित्य नहीं हैं। ’’

 

उद्देश्य:-

ɍवैश्वीकरण का प्रभाव समाज पर सकारात्मक पड़ता है।

ɍसाहित्य का समाज पर महत्वपूर्ण प्रभाव देखने को मिलता है।

 

परिकल्पना:-

ɍवैश्वीकरण की धारणा परिवर्तनीय नहीं होगा।

ɍवैश्वीकरण का प्रभाव समाज पर सार्थक पड़ेगा।

 

शोध प्रविधि:-

शोधकर्ता ने मौलिक विचार और द्धैतीयक आंकड़ों का सहारा लेकर शोधपत्र तैयार किया है।

 

वैश्वीकरण के कारण समाज एवं व्यक्ति में परिवर्तनः

वैश्वीकरण के दौर में जब जीवन के प्रत्येक क्षेत्रों में बदलाव होता जा रहा है। वहीं साहित्य भी प्रभावित हुआ है। साहित्य जो व्यक्ति के जीवन को सींचित करता है, रस प्र्रदान करता हैै। उसे आनंदमय प्रदान बनाता है, उसी साहित्य से मानव दूर होता जा रहा है। कारण कि आज व्यक्ति का जीवन भागमभाग हो गया है, साहित्य का सृजन करने और पठन पाठन करने के लिए हमे पर्याप्त समय चाहिए किन्तु आज की जो जीवन शैली है। वह व्यक्ति के समय  को छीन लिया है, इस बदलाव के कई कारण हैं-

 

(1) आधुनिकीकरण ने मानव के सोच को प्रभावित किया है। औद्योगिक क्रांति एवं वैज्ञानिक आविष्कार के फलस्वरुप आज के मानव को अनेक भौतिक सुविधायें मिली है। भौतिक चकाचैंध में लोग आनंद के स्वरुप (साहित्य) को भूलते जा रहे है। इस प्रकार बुद्धि का विकास तो होता जा रहा है। क्रिंन्तु हृदय भी संवेदना शून्य हो रहा हैं।

 

(2) पहले मनुष्य की आवश्यकता सीमित थी, सीमित आवश्यकता की पूर्ति के बाद मनुष्य मनोरंजन के साधन के रुप मंें कला, साहित्य की ओर ध्यान देता था। ग्रामीण जनता जो निरक्षर थी इनमें भी कला और साहित्य के प्रति आकर्षण था, जो आज लोक कला और लोक साहित्य के नाम से जाना जाता है। किन्तु आज मनुष्य की आवश्यकता असीमित है, असीमित आवश्यकता की पूर्ति में बुद्धि और समय दोनों की खपत हो जाती है।

 

(3) जातिवाद और क्षेत्रवाद से मानव जब तक ऊपर नहीं उठेगा, तब तक कालजयी कृति की रचना नहींे कर सकता। मानव, मानव होता है चाहे वह अमेरिका का हो या जापान का या फिर भारत का। मैं और मेरा देश की सोच, भारत में तो स्थिति और भी बुरी है, आज क्षेत्र वाद जिस प्रकार अपना सिर उठा रहा है। वह साहित्यकारों के लिए एक चुनौती है। वह क्षेत्र से ऊपर उठकर साहित्य सृजन करेगा, तभी मानवता के धरातल पर सृजित रचना समाज को दे पायेगा।

 

(4) मानव हित में भाव और विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता आवश्यक है, संकीर्णता या स्वार्थी तत्व इसका विरोध करता है तभी तो मानव के शोषण के विरुद्ध उठे आवाज के लिए मुस्लिम देशों में फतवा जारी कर दिया जाता है।

 

इस प्रकार बुद्धिवाद, व्यक्तिवाद, संकीर्णता, क्षेत्रवाद आदि कारण है। जो साहित्य के लिए चुनौती है। जब तक हम भारत के उदार संस्कृति को अपनाकर अपने जीवन शैली को नहीं अपनायेंगे, तब तक मानव संस्कृति साहित्य का निर्माण संभव नहीं होगा।

 

वैश्वीकरण की चुनौती और साहित्य:-

वर्तमान दौर में, जहां एक तरफ भौतिकतावाद, बाजार के लोक-लुभावन वादे के साथ हमारे समाज को बुरी तरह अपनी गिरफ्त में ले चुका है। वहीं दूसरी तरफ साहित्य, कला, संस्कृति जैसी मानवीय अस्मिता से जुड़ी चीजें चाहें अनचाहे समाज से दूर होती जा रही है। मनुष्य इतना आत्मकेन्द्रित हो गया है कि उसे अपने स्व-हित से कुछ सोचने -विचारने और समझने का वक्त ही नहीें मिलता। साहित्य, जिसकी उत्पत्ति ही ‘‘ सहित्य भावः ‘‘ यानि समाज के स-हित के भाव के साथ हुई थी और सभ्यता के विकास में जिसकी जरुरी भुमिका रही। आज उसकी प्रासंगिकता तक प्रश्न उठाये जा रहे हैं। क्या वाकई साहित्य और समाज के रिस्ते इतने जर्जर हो चुके है? क्या साहित्य अपनी उपादेयता  और प्रासंगिकता खो चुका है। या कि साहित्य अपनी सामाजिक जिम्मेदारी सें ही कटता जा रहा है ? यह भी कि वर्तमान भूमण्डलीय व्यवस्था में साहित्य, संस्कृति का सामाजिक नजरिये से कोई मोल है या वे महज छपे हुए शब्द भर है।

 

कहते हैं, साहित्य समय का सहचर होता है। क्या आज के बदलते समय संदर्भ का सहचर हमारा साहित्य है ? इक्कीसवीं सदी की अपेक्षाओं से हमारा साहित्य जुड़ा है, जुड़ पाया है या कि जुड़ने की तैयारी रखता है। इत्यादि सवालों पर चर्चा-परिचर्चा आज के समय की मांग है। नई सृष्टि के शुरुवाती दिनों में यह इसलिए भी जरुरी है क्योंकि यह प्रगत विकासवाद वाली सदी है। प्रत्येक सदी के अपने सपने और चुनौतिया होती है, जाहिर है, वर्तमान सदी की भी है। साहित्य उन सपनों और चुनौतियों से इत्तेफाक न रखे, यह संभव नहीं।

 

निष्कर्ष:-

वैश्वीकरण के कारण हमारे देश की संस्कृति और आंचलिक पर्यावरण का अस्तित्व समाप्त होते जा रहा है। आज आवश्यकता है कि वैश्वीकरण को हम उतना ही अपनाएं जिससे हमारी स्थानीयता, आंचलिकता और भारतीयता लुप्त ना हो।

 

विश्व से जुड़ना आवश्यक कदम है किन्तु अपनी आत्मा अर्थात संस्कृति को विलुपत कर और अध्यात्म को अस्वीकार कर वैश्विक परिदृश्य को अपनाना उचित नहीं है। आज का वर्ग नाना प्रकार के फास्ट फूडों का प्रचलन बच्चों को अर्थात नई पीढ़ी के स्वास्थ्य के प्रति जागरुक कहा कर पा रहा है। इसी तरह हमारे मेले-ठेले, पर्व, उत्सव के कुटीर उद्योगों द्वारा निर्मित वस्तुएं और आंचलिक पकवान दयनीय स्थिति में है। जबकि देशी उत्पाद उन्नति के शिखर पर पहुच रहे हैं। यह स्वदेशी के प्रति अनिच्छा और विदेशी के प्रति अपेक्षा का परिणम है। इससे बचकर ही हमें वैश्वीक पृष्ठभूमि को ही स्वीकर करना होगा।

 

REFRENCES :-

1.  कामकाजी हिन्दी भूमण्डलीकरण के दौर मंे - डा. देशबंधु राजेश, भावना प्रकाशन दिल्ली, पृ.-9 से 11 ,

2.  भारतीय साहित्य- जगदीश यादव,

3.  मौलिक विचार,

4.  इन्टरनेट संचार माध्यम,

5.  कुरुक्षेत्र 2001 - मई,

6.  योजना 2000, जून,

7.  ठाकुर, डां. विद्याचंद्र, लोकसाहित्य में त्रिगत संदर्भ,

8.  वर्मा, डां. शकुंतला, लोकसाहित्य का अध्ययन, पृ. क्र.10,11

9.  दत्त एवं सुंदरम् , भारतीय अर्थव्यवस्था,

10. See, Amartyasen: Development as freedom Oxford University Press] 2000.

 

 

Received on 03.06.2015       Modified on 12.06.2015

Accepted on 28.06.2015      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 3(2): April- June. 2015; Page 62-65